ज़ौनायदी के अनुसार, इतिहास में अमेरिका के सत्ता परिवर्तन और सैन्य हस्तक्षेप की एक लंबी श्रृंखला देखने को मिलती है, जिसका प्रभाव वेनेज़ुएला, इराक, लीबिया और पनामा जैसे देशों पर पड़ा है। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि वॉशिंगटन ने कभी भी अंतर्राष्ट्रीय समझौतों और संयुक्त राष्ट्र घोषणापत्र का पूरी तरह से पालन नहीं किया है, जो देशों के राजनीतिक मामलों में हस्तक्षेप करने पर रोक लगाते हैं।
ज़ौनायदी ने यह भी कहा कि अमेरिका की विदेश नीति वास्तव में क्षमता का तर्क, शक्ती प्रदर्शन और राजनीतिक दबाव पर आधारित है, जो प्रायः नैतिक और कानूनी रुकावटों को अनदेखा कर देती है।
उन्होंने आगे कहा कि वॉशिंगटन ईरान के परमाणु कार्यक्रम की बुराई कर रहा है, जबकि इज़राइल द्वारा न्यूक्लियर हथियारों के परमाणु अप्रसार समझौते पर हस्ताक्षर करने और डिमोना साइट पर IAEA निरीक्षण की अनुमति देने के अस्वीकरण को अनदेखा कर रहा है।
अंतरराष्ट्रीय कानून प्रोफेसर ने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि अनुभव से पता चलता है कि अमेरिका का कोई सच्चा मित्र नहीं है, क्योंकि उसने इस क्षेत्र में अपने साथियों को बार-बार छोड़ा है, उन पर आक्रमण किए हैं।
उन्होंने कहा कि इज़राइल के साथ मिलकर वॉशिंगटन का सामरिक लक्ष्य क्षेत्रों का मानचित्र फिर से बनाना और अरब देशों को बांटकर एक ऐसा "नया मध्य पूर्व" बनाना है जिसमें कोई क्षमता न हो, जहाँ इज़राइल अहम भूमिका निभाएगा और समुद्री मार्गों, जलडमरूमध्य और प्राकृतिक संसाधनों पर पूरा नियंत्रण रखेगा।