उन्होंने कहा, "आज असली बातचीत और कूटनीति की गरिमा लगभग खत्म हो चुकी है। अब हर दिन नए प्रस्ताव सामने आते हैं, जिनका मकसद समझौता नहीं बल्कि दबाव बनाना होता है।"
गोंचारॉफ के मुताबिक, फ्रीज़ की गई संपत्तियों का इस्तेमाल प्रॉक्सी युद्धों को फंड करने में करना लंबे समय तक टिकने वाली रणनीति नहीं है। इससे दूसरे देशों का भरोसा उन मुद्राओं से उठने लगता है जिनका इस्तेमाल पश्चिम करता है, खासकर अमेरिकी डॉलर और यूरो से।
उन्होंने कहा, "दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाएं लंबे समय से जरूरत से ज्यादा उधार लेकर अपनी व्यवस्था चला रही हैं। अब कर्ज देने वाले देशों को भी साफ दिखने लगा है कि यह मॉडल आत्मघाती साबित हो रहा है, क्योंकि इसमें अंतरराष्ट्रीय और कई बार संवैधानिक कानूनों तक की अनदेखी की जाती है।"
गोंचारॉफ ने यह भी कहा कि अब दुनिया ऐसे विकल्प तलाश रही है जो G7 देशों की फिएट मुद्राओं पर निर्भर न हों। इसी वजह से BRICS देशों और अन्य राष्ट्रों द्वारा BRICS Pay, CIPS, CBDC, क्रिप्टोकरेंसी और स्टेबलकॉइन्स जैसे नए वित्तीय सिस्टम विकसित किए जा रहे हैं।
उन्होंने अंत में कहा, "आने वाले समय में खुद साफ हो जाएगा कि दुनिया किन भुगतान प्रणालियों को अपनाती है और कौन-सी व्यवस्था पीछे छूट जाती है।"