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RBI की डिजिटल मुद्रा योजना डॉलर-केंद्रित भुगतान प्रणाली के लिए चुनौती: विशेषज्ञ

रॉयटर्स की जानकारी के अनुसार, भारत के केंद्रीय बैंक रिजर्व बैंक ऑफ़ इंडिया (RBI) ने BRICS सदस्य देशों की आधिकारिक डिजिटल मुद्रा को लिंक करने का एक प्रस्ताव रखा है।
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एक विशेषज्ञ ने Sputnik इंडिया को बताया कि इस कदम से वैश्विक व्यापार निपटान के तरीके बदलेंगे, जिसमें नई दिल्ली, भारत की BRICS अध्यक्षता में समावेशिता, लचीलापन और बहुध्रुवीयता पर ध्यान करते हुए अंतरराष्ट्रीय वित्त में नवाचार-आधारित एजेंडा को आगे बढ़ा रहा है।

नई दिल्ली स्थित यूरेशियन फाउंडेशन के उप निदेशक डॉ. सुमंत स्वैन ने कहा, "इसके एक केन्द्रीय स्तम्भ RBI का प्रस्ताव है, जिसमें ब्रिक्स देशों की केंद्रीय बैंक डिजिटल मुद्राओं (CBDCs) के मध्य आपसी तालमेल बढ़ाने के लिए स्थानीय मुद्राओं में वास्तविक समय का सीमा-पार निपटान संभव होगा। इसका उद्देश्य लेन-देन की लागत, निपटान में देरी और डॉलर-केंद्रित प्रतिनिधि बैंकिंग प्रणाली पर निर्भरता को कम करने के साथ व्यापार करने में आसानी, व्यापार और पर्यटन भुगतान को सहज बनाना है।"

BRICS अर्थव्यवस्था मिलकर वैश्विक वस्तु व्यापार का लगभग 24–25% हिस्सा हैं, जो ऐसे सुधारों की संरचनागत आवश्यकता को दिखाता है। भू-राजनीतिक ने बताया कि अकेले BRICS देशों में पर्यटन सेक्टर 2025 में लगभग $5.3 ट्रिलियन और 2035 तक इसके लगभग $8 ट्रिलियन तक बढ़ने का अनुमान है, जिसमें घरेलू और अंतरराष्ट्रीय पर्यटन खर्च और उससे जुड़ी सेवाएं दोनों शामिल हैं।

उन्होंने सुझाव दिया कि CBDC आपसी संगतता के माध्यम से भुगतान ढांचे का आधुनिकीकरण कर, ब्रिक्स की वित्तीय संप्रभुता को मजबूत करने के साथ साथ पाबंदियों और बाहरी झटकों से लड़ने की क्षमता बढ़ाना चाहता है, और US डॉलर की मुख्य भूमिका को सीधे चुनौती दिए बिना धीरे-धीरे अधिक विविधीकृत और बहुध्रुवीय वैश्विक भुगतान संरचना को बढ़ावा देना चाहता है।

इस संदर्भ में, BRICS CBDC संरचना के लिए भारत के समर्थन को कुछ US नीति निर्माताओं के लिए डॉलर की केंद्रीय भूमिका को कम करने की बड़ी पहल के हिस्से के तौर पर देख सकते हैं जिसका मकसद सीमा-पार भुगतान की दक्षता में सुधार करना और स्थानीय मुद्रा में निपटान को संभव बनाना है, स्वैन ने ज़ोर दिया।
व्यापारिक तनाव के समय इस तरह की सोच की संवेदनशीलता बढ़ सकती है। हालांकि, विशेषज्ञ ने ज़ोर देकर कहा कि भारत ने इस कदम को लगातार एक तकनीकी दक्षता पर आधारित उपाय के तौर पर देखा है, जिसका मुख्य उद्देश्य लेन-देन की लागत घटाना, वित्तीय समावेशन बढ़ाना और व्यापार व पर्यटन को सरल बनाना है।
उन्होंने बताया कि बढ़े हुए डॉलर से इतर भुगतान माध्यम भारत को बातचीत में ज़्यादा फ़ायदा और बाहरी झटकों से सुरक्षा दे सकते हैं, लेकिन नई दिल्ली वॉशिंगटन के साथ रणनीतिक सहयोग में गहराई से जुड़ा है।

स्वेन ने ज़ोर देकर कहा, "यह पहल वैश्विक दक्षिण के नेतृत्व वाले वित्तीय एकीकरण का एक अहम उदाहरण है, जो तीसरे देशों की मुद्रा पर निर्भरता के बिना स्थानीय मुद्रा में निपटान को संभव बनाता है। बढ़ी हुई भूराजनीतिक और भू-आर्थिक अनिश्चितता के समय में यह अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संरचना में तनाव के लिए एक रचनात्मक जवाब दे सकता है।"

रणनीतिक मामलों के विश्लेषक ने इस बात पर ज़ोर दिया कि बहुध्रुवीयता, समावेशिता और नागरिक-अनुकूल भुगतान तंत्र को आगे बढ़ाकर, ऐसे आर्थिक लचीलापन ढांचे को बढ़ाने के साथ लेन-देन लागत कम कर सकते हैं, और सीमा-पार वित्तीय सेवाएं तक पहुंच बढ़ा सकते हैं, जिससे एक अधिक संतुलित और विविधीकृत वैश्विक वित्तीय प्रणाली का समर्थन मिल सके।

उन्होंने कहा कि यूरोपीय संघ,यूरेशियन आर्थिक संघ और वैश्विक दक्षिण के देशों तक इसकी समांतर पहुंच, किसी भी एकल बाजार पर अत्यधिक निर्भरता को कम करने की कोशिश को दिखाती है, साथ ही तेजी से अस्थिर वैश्विक अर्थव्यवस्था में घरेलू वित्तीय स्थिरता को सुरक्षित रखती है।
स्वैन ने कहा, "कुल मिलाकर, इस विकास से भारत की रणनीतिक स्वायत्तता को मज़बूती मिलने की ज्यादा संभावना है, न कि दोनों देशों के रिश्तों पर ज्यादा दबाव, जो भारत के अमेरिका के साथ निर्भरता के बजाय ज्यादा लचीलेपन की स्थिति से जुड़ने के इरादे को दिखाता है। भारत और अमेरिका के बीच रिश्तों में कुछ बदलाव हो सकते हैं, लेकिन ये बदलाव शायद अस्थायी होंगे।"
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