ये रडार पहाड़, बहुत ऊंचे क्षेत्रों, समुद्र तटों यहां तक कि इमारतों में भी लगाए जाएंगे ताकि शत्रु द्वारा किए जाने वाले ड्रोन हमलों को रोका जा सके। 725 करोड़ रुपए कीमत के इन रडार की खरीदी फास्ट ट्रैक प्रक्रिया से की जाएगी जो एक वर्ष में पूरी हो जाएगी।
सेना द्वारा अपनी वेबसाइट पर मांगी गई जानकारी के मुताबिक ये रडार 50 किमी की दूरी से एक साथ 100 लक्ष्यों का पीछा करने में सक्षम होने चाहिए। ट्रैक करने के बाद ये 20 किमी तक की दूरी पर तैनात एयर डिफेंस सिस्टम को एक साथ 20 लक्ष्यों के बारे में जानकारी दे सकें ताकि उन्हें नष्ट किया जा सके।
ये रडार शून्य से 20 डिग्री नीचे से लेकर 45 डिग्री सेल्सियस तक के तापमान में काम कर सकें। इन्हें 5000 मीटर की ऊंचाई तक के क्षेत्रों में तैनात किया जा सके और यह 4 घंटे तक की रिकॉर्डिंग कर सकें। इसका अर्थ है कि भारतीय सेना इन्हें हिमालय के ऊंचे क्षेत्रों, राजस्थान के मैदानों तक में इन्हें तैनात करना चाहती है। इनका भार 175 किग्रा तक हो और इन्हें पैदल सैनिक, वाहन या हेलीकॉप्टर के नीचे लटकाकर ले जाया जा सके।
भारतीय सेना इन रडार को एयर डिफेंस के आकाशतीर नेटवर्क से जोड़ने की तैयारी कर रही है। आकाशतीर भारतीय सेना द्वारा विकसित किया गया ऐसा नेटवर्क है जिससे हर रडार और एयर डिफेंस सिस्टम को जोड़ा गया है। आकाशतीर से शत्रु के किसी भी हवाई हमले का रडारों की शृंखला से पता लगाया जाता है और सबसे उपयुक्त एयर डिफेंस सिस्टम से उसे नष्ट किया जाता है।