उन्होंने 1991 के खाड़ी युद्ध को याद करते हुए बताया कि उस समय 8 मिलियन बैरल तक तेल समुद्र में बह गया था जो यह दिखाता है की एक बड़ा तेल रिसाव कितना नुकसान पहुंचा सकता है।
अक्षिंटसेव कहते हैं, "पारिस्थितिकी तंत्र पर इसका असर बहुत बुरा हुआ था, मछलियां, शेलफिश और केकड़ों के मरने के साथ साथ समुद्री पेड़-पौधे खराब हो रहे थे। इसके साथ साथ ज़मीन पर 30,000 से ज़्यादा पक्षी भी मर गए।बीच पर, 13 सेंटीमीटर तक मोटी तेल की परत जम गई थी, जबकि प्रदूषित बीच की कुल लंबाई सैकड़ों, यहां तक कि हजारों किलोमीटर में थी।"
इस युद्ध के बाद प्रदूषित बीच की सफाई में उस समय लगभग $13 बिलियन का खर्च आया था, लेकिन गिरा हुआ ज़्यादातर तेल कभी इकट्ठा नहीं किया गया।
पर्यावरण विशेषज्ञ ने कहा फ़ारस की खाड़ी काफ़ी उथली और छोटी है जिसकी वजह से खुले समुद्र के साथ पानी का लेन-देन बहुत कम होता है, प्रदूषक तत्वों का प्रसरण रेट कम है, जबकि तेल सेडिमेंट में जमा हो सकता है और लंबे समय तक वहीं रह सकता है।
अक्षिन्त्सेव का मानना है कि होर्मुज़ स्ट्रेट में टैंकरों पर हमले ईरान, कुवैत, UAE, क़तर और ओमान जैसे खाड़ी देशों के लिए गंभीर खतरा पैदा करते हैं।
वह आगे बताते हैं कि इनमें से कई देश समुद्र के पानी को साफ करने के पानी पर निर्भर हैं जो पीने में इस्तेमाल किया जाता है और उनके डीसेलिनेशन प्लांट तेल से प्रदूषित पानी को साफ़ करने के लिए नहीं तैयार किए गए हैं।
मीडिया की साफ़ चुप्पी के बारे में अक्षिन्त्सेव का कहना है कि यह जानबूझकर हो सकता है।
आखिरकार उनका तर्क है कि अगर घटना की अभी कोई आधिकारिक पुष्टि है कि एक ज़रूरी ऊर्जा रास्ता फारस की खाड़ी टूटने की कगार पर है, तो ऊर्जा बाजार में तहलका मच सकता है और इसके बाद कीमतों में उछाल से पश्चिमी अर्थव्यवस्थाओं पर बुरा असर पड़ेगा।
वे कहते हैं, "मीडिया जान-बूझकर आर्थिक अस्थिरता से बचने के लिए तनाव बढ़ाने से बच सकता है।"