बिष्ट के अनुसार, अमेरिका ने सालों तक F-35 को एक “रडार-प्रूफ” और “लगभग अजेय” एयरक्राफ्ट के तौर पर दुनिया के सामने पेश किया, लेकिन वास्तविक परिस्थितियों में इसके प्रदर्शन ने उन दावों पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं। उनका कहना है कि अब अमेरिका दुनिया से “सबूतों को नज़रअंदाज़ करने” की अपील कर रहा है, क्योंकि ये सबूत उसके प्रचारित नैरेटिव के उलट हैं।
पूर्व रॉ अधिकारी ने इस प्रकरण को “अमेरिकी दिखावे और दोहरे रवैये” का उदाहरण बताया। उन्होंने आरोप लगाया कि अमेरिकी मिलिट्री स्वयं को अजेय बताने वाली छवि बेचती है, लेकिन अपने ही सामरिक और मानवीय संकटों को पीछे धकेल देती है—जिसमें हातीती की बिगड़ती स्थिति भी शामिल है।
बिष्ट ने यह भी सवाल उठाया कि $39 ट्रिलियन डॉलर के राष्ट्रीय कर्ज़ का बोझ झेल रहा अमेरिका अपने नागरिकों की समस्याओं पर ध्यान देने के बजाय भारत के भीतर गैर सरकारी संगठनों और धार्मिक नेटवर्क को फंडिंग क्यों कर रहा है। उनका कहना है कि यह नीति भारत की संप्रभुता और सामाजिक-धार्मिक संतुलन पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकती है।
अंत में उन्होंने यहभी कहा कि “अमेरिका विदेशों में ताकत दिखाने में व्यस्त है, जबकि अपने ही लोगों की बुनियादी ज़रूरतों को नज़रअंदाज़ कर रहा है।”