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रूसी वैज्ञानिकों ने सूक्ष्मजीवों की मदद से मंगल की सतह जैसी मिट्टी में उगाया जौ
रूसी वैज्ञानिकों ने सूक्ष्मजीवों की मदद से मंगल की सतह जैसी मिट्टी में उगाया जौ
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सदर्न फेडरल यूनिवर्सिटी (SFedU) के शोधकर्ताओं ने मंगल के रेगोलिथ जैसी मिट्टी से जौ के पहले अंकुर उगाने में सफलता हासिल की है।
2025-11-30T08:00+0530
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विश्वविद्यालय ने Sputnik को बताया कि वैज्ञानिकों ने मिट्टी में सूक्ष्मजीवों का एक खास मिश्रण मिलाया। इसमें जीवाणु और यीस्ट के दस प्रकार थे जो एक-दूसरे को ज़िंदा रहने में मदद कर पोषक तत्वों का एक स्तर बनाते हैं।पौधों के उगने के लिए मिट्टी में अपघटित जैव पदार्थ भरपूर होने चाहिए। यह जैविक पदार्थ का एक जटिल मिश्रण है जिससे पौधे पोषक तत्व लेते हैं। SFedU के वैज्ञानिकों ने बताया कि अपघटित जैव पदार्थ सूक्ष्मजीवों की गतिविधि से बनता है जो बेजान ज़मीन पर "आबादी बढ़ाकर" उसे उपजाऊ मिट्टी में बदल देते हैं।मंगल की मिट्टी "बेजान" धरती का एक कठोर रूप है, इसमें किसी भी तरह के पोषक तत्व नहीं होते लेकिन इसमें धात्विक लवण भरपूर होते हैं जो पौधों के बढ़ने में रुकावट डालते हैं।वैज्ञानिकों ने साइनोबैक्टीरिया, जो कार्बन डाइऑक्साइड को सोखकर प्रकाश संश्लेषण करते हैं, और बायोमास बनाने वाले एक्टिनोमाइसेट्स व बेसिली जैसे सूक्ष्मजीवों की मदद से जौ उगाने में सफलता हासिल की है। इसके अलावा, अन्य रोगाणुओं ने मिट्टी को मजबूत बनाकर उसे तनाव झेलने में सक्षम बनाया, जिससे जौ का उगना संभव हो सका।हालांकि बिना मिट्टी या मिट्टी के दूसरे विकल्प में पौधे उगाना कोई नई बात नहीं है, हाइड्रोपोनिक्स इसका एक उदाहरण है। प्राज़्दनोवा ने बताया कि नियंत्रित प्रयोगशाला वातावरण के बाहर फसल उगाना एक गंभीर चुनौती बनी हुई है। इसमें खराब उत्तरी मौसम, बहुत ज्यादा प्रदूषित इलाके और भविष्य में दूसरे ग्रह भी शामिल हैं।इस शोध को सॉइल बायोइंजीनियरिंग टेक्नोलॉजीज़ टेक्नोलॉजिकल स्ट्रेटेजिक प्रोजेक्ट के तहत, नेशनल यूथ एंड चिल्ड्रन स्कीम के हिस्से, प्रायोरिटी-2030 स्ट्रेटेजिक एकेडमिक लीडरशिप प्रोग्राम की सहायत से किया गया।
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रूसी वैज्ञानिकों ने सूक्ष्मजीवों की मदद से मंगल की सतह जैसी मिट्टी में उगाया जौ
सदर्न फेडरल यूनिवर्सिटी (SFedU) के शोधकर्ताओं ने मंगल ग्रह की सतह जैसी मिट्टी से जौ के पहले अंकुर उगाने में सफलता हासिल की है।
विश्वविद्यालय ने Sputnik को बताया कि वैज्ञानिकों ने मिट्टी में सूक्ष्मजीवों का एक खास मिश्रण मिलाया। इसमें जीवाणु और यीस्ट के दस प्रकार थे जो एक-दूसरे को ज़िंदा रहने में मदद कर पोषक तत्वों का एक स्तर बनाते हैं।
पौधों के उगने के लिए
मिट्टी में अपघटित जैव पदार्थ भरपूर होने चाहिए। यह जैविक पदार्थ का एक जटिल मिश्रण है जिससे पौधे पोषक तत्व लेते हैं। SFedU के वैज्ञानिकों ने बताया कि अपघटित जैव पदार्थ सूक्ष्मजीवों की गतिविधि से बनता है जो बेजान ज़मीन पर "आबादी बढ़ाकर" उसे उपजाऊ मिट्टी में बदल देते हैं।
मंगल की मिट्टी "बेजान" धरती का एक कठोर रूप है, इसमें किसी भी तरह के पोषक तत्व नहीं होते लेकिन इसमें धात्विक लवण भरपूर होते हैं जो पौधों के बढ़ने में रुकावट डालते हैं।
SFedU की मॉलिक्यूलर जेनेटिक्स ऑफ़ माइक्रोबियल कंसोर्टिया यूथ लेबोरेटरी की हेड एवगेनिया प्राज़्दनोवा के अनुसार, मिट्टी में सूक्ष्मजीवों के स्तर को बढ़ाना या जैव उपचार, आग या इंसानी प्रदूषण से बंजर हुई जमीन को ठीक करने के सबसे असरदार तरीकों में से एक है। शोधकर्ताओं ने मोजावे रेगिस्तान की रेत से बनी मॉडल मंगल जैसी मिट्टी पर भी यही तरीका इस्तेमाल किया।
वैज्ञानिकों ने साइनोबैक्टीरिया, जो कार्बन डाइऑक्साइड को सोखकर
प्रकाश संश्लेषण करते हैं, और बायोमास बनाने वाले एक्टिनोमाइसेट्स व बेसिली जैसे सूक्ष्मजीवों की मदद से जौ उगाने में सफलता हासिल की है। इसके अलावा, अन्य रोगाणुओं ने मिट्टी को मजबूत बनाकर उसे तनाव झेलने में सक्षम बनाया, जिससे जौ का उगना संभव हो सका।
हालांकि बिना मिट्टी या मिट्टी के दूसरे विकल्प में पौधे उगाना कोई नई बात नहीं है, हाइड्रोपोनिक्स इसका एक उदाहरण है। प्राज़्दनोवा ने बताया कि
नियंत्रित प्रयोगशाला वातावरण के बाहर फसल उगाना एक गंभीर चुनौती बनी हुई है। इसमें खराब उत्तरी मौसम, बहुत ज्यादा प्रदूषित इलाके और भविष्य में दूसरे ग्रह भी शामिल हैं।
प्राज़्दनोवा ने कहा, "रूसी विज्ञान अकादमी के IMBP के साथ मिलकर, बायोन-एम नंबर 2 अंतरिक्ष यान पर दस सूक्ष्मजीवों के उसी ग्रुप को भी अंतरिक्ष भेजा गया था, जो 18 अक्टूबर को सफलतापूर्वक धरती पर लौट आया।" "अब हमें यह देखना होगा कि अंतरिक्ष यान की उड़ान के दौरान दौरान बैक्टीरिया और यीस्ट कैसे बदले, और क्या उन्हें मिट्टी को उपजाऊ बनाने की क्षमता बनाए रखते हुए दूसरे ग्रह पर ले जाया जा सकता है या नहीं।"
इस शोध को सॉइल बायोइंजीनियरिंग टेक्नोलॉजीज़ टेक्नोलॉजिकल स्ट्रेटेजिक प्रोजेक्ट के तहत, नेशनल यूथ एंड चिल्ड्रन स्कीम के हिस्से, प्रायोरिटी-2030 स्ट्रेटेजिक एकेडमिक लीडरशिप प्रोग्राम की सहायत से किया गया।