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खनन से मैग्नेट तक: दुर्लभ मृदा क्षेत्र में भारत-रूस सहयोग की संभावनाएं

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Gallium crystal - Sputnik भारत, 1920, 01.03.2026
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यूरेशियन संसाधन रणनीति समूह नाम के स्वतंत्र थिंक टैंक की अनन्या राव ने Sputnik से बात करते हुए कहा की भारत और रूस के बीच दुर्लभ मृदा तत्वों में सहयोग रणनीतिक रूप से सही है लेकिन तभी जब दोनों देश सिर्फ़ निकालने के बारे में सोचना बंद कर दें।
रोसाटॉम ने Sputnik इंडिया को पुष्टि की है कि भारत की TEXMiN और रूस की GIREDMET ने दुर्लभ मृदा तत्वों और महत्वपूर्ण खनिज तकनीक पर मिलकर काम करने के लिए एक MoU पर हस्ताक्षर किए हैं

अनन्या राव ने कहा, "रूस के पास दुर्लभ मृदा तत्वों (रेयर अर्थ) के बड़े भंडार हैं, लेकिन उनकी शोधन क्षमता अभी पूरी तरह विकसित नहीं हुई है। भारत को दुर्लभ मृदा तत्वों को खोदने और अलग करने का अनुभव है, फिर भी वह उच्च-शुद्धता वाले पदार्थों और उन्नत मैग्नेट के उत्पादन के लिए आयात पर निर्भर है यानी दोनों देश आपूर्ति श्रृंखला के बीच में हैं, सबसे ऊपर नहीं।"

यूरेशियन संसाधन रणनीति समूह की राव आगे कहती हैं कि सिर्फ 'रूस खनन करे और भारत खरीदे' वाला मॉडल न होकर दोनों देशों का मिलकर पूरी आपूर्ति श्रृंखला में काम करना ही बेहतर रास्ता है।

उन्होंने कहा, "कल्पना कीजिए कि रूसी सुदूर पूर्व में भारत-रूस के संयुक्त उद्यम हों, जो माइनिंग से लेकर अलग करने, मिश्र धातु बनाने और अंत में मैग्नेट बनाने तक पूरा काम करें और असली रणनीतिक ताकत कच्चे अयस्क में नहीं, बल्कि NdFeB मैग्नेट, रक्षा इस्तेमाल करने, EV मोटर्स और विंड टर्बाइनों के निर्माण की क्षमता हासिल करने में है।"

रूस और भारत के बीच दुर्लभ मृदा तत्वों पर बात करते हुए अनन्या आगे कहती हैं की एक भूराजनीतिक सोच भी है। दोनों देश रूस के मामले में पश्चिमी देशों के प्रतिबंध और भारत के मामले में चीन के दुर्लभ खनिजों के एकाधिकार के असर को कम करने में दिलचस्पी रखते हैं और सहयोग टकराव के बजाय विविधीकरण का रास्ता खोल सकता है।

यूरेशियन संसाधन रणनीति समूह नाम के स्वतंत्र थिंक टैंक की अनन्या राव ने आगे कहा, "एक और आशाजनक क्षेत्र, जिस पर अब तक कम ध्यान दिया गया है, वह है 'दुर्लभ खनिजों का पुनर्चक्रण'। भारत में ई-कचरे की मात्रा तेज़ी से बढ़ रही है। ऐसे में, रूस के उन्नत सामग्री विज्ञान संस्थानों के साथ मिलकर दुर्लभ खनिजों के पुनर्चक्रण पर एक संयुक्त शोध मंच तैयार किया जा सकता है। यह न केवल आपूर्ति की एक समानांतर कड़ी बनेगा, बल्कि प्राथमिक खनन की तुलना में राजनीतिक रूप से कम संवेदनशील भी होगा।"

अंत में अनन्या राव कहती हैं कि वित्तीय ढांचा भी ज़रूरी है और अगर परियोजनाओं को रुपया-रूबल भुगतान प्रणाली के तहत रखा जाए, तो लंबे समय के निवेश डॉलर से जुड़े जोखिम और प्रतिबंधों के उतार-चढ़ाव से काफी हद तक सुरक्षित रह सकते हैं।
Representative image - Sputnik भारत, 1920, 19.02.2026
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