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अमेरिकी मध्यावधि चुनावों का ट्रंप की विदेश नीति पर क्या असर पड़ेगा?
अमेरिकी मध्यावधि चुनावों का ट्रंप की विदेश नीति पर क्या असर पड़ेगा?
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अमेरिकी मध्यावधि चुनावों में कांग्रेस का नियंत्रण दांव पर है। दोनों सदनों में डेमोक्रेट की जीत से ईरान युद्ध और इज़रायल को सैन्य मदद पर खर्च सीमित हो सकता है।... 03.11.2026, Sputnik भारत
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अमेरिकी कानूनी विशेषज्ञ और पूर्व न्यायाधीश एंड्रयू नैपोलिटानो के मुताबिक, अगर डेमोक्रेट प्रतिनिधि सभा और सीनेट दोनों में बहुमत हासिल कर लेते हैं, तो वे राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की विदेश नीति पर खर्च के फैसलों को काफी हद तक सीमित कर सकते हैं। उनके अनुसार, कांग्रेस ईरान के खिलाफ युद्ध और इज़रायल को सैन्य सहायता के लिए आवंटन घटा सकती है। साथ ही, वह प्रशासन को यूक्रेन के लिए मंजूर धनराशि जारी करने के लिए बाध्य कर सकती है।उन्होंने कहा कि अगर ट्रंप मंजूर धनराशि जारी करने से इनकार करते हैं, तो सुप्रीम कोर्ट के पिछले फैसलों के आधार पर कांग्रेस उन पर अमल करा सकती है। उनके मुताबिक, डेमोक्रेट बहुमत मिलने पर प्रशासन के खिलाफ कई जांचें भी शुरू कर सकते हैं, जिससे ट्रंप के लिए विदेश नीति पर ध्यान देना मुश्किल होगा।एक सदन में भी बहुमत बदला तो बढ़ सकता है टकरावअमेरिकी संवैधानिक इतिहास के जानकार और राजनीतिक टिप्पणीकार डैन लज़ार का मानना है कि किसी एक सदन में भी डेमोक्रेट की जीत से ध्रुवीकरण बढ़ सकता है। उनके मुताबिक, डेमोक्रेट रूस और चीन के प्रति ज्यादा सख्त रुख अपना सकते हैं और ताइवान को लेकर बीजिंग के साथ टकराव उनके एजेंडे में जगह पा सकता है।लज़ार के अनुसार, डेमोक्रेट अपने बहुमत का इस्तेमाल ट्रंप प्रशासन के फैसलों को रोकने के लिए कर सकते हैं। जवाब में व्हाइट हाउस भी जवाबी कदम उठा सकता है, जिससे तनाव और बढ़ेगा। उन्होंने कहा कि अमेरिकी राजनीतिक व्यवस्था में सांसदों का एक छोटा समूह भी कई प्रक्रियात्मक प्रावधानों का इस्तेमाल कर विधायी कामकाज रोक सकता है। सत्ता के केंद्रीकरण को रोकने के लिए बनाए गए ये प्रावधान अब दोनों दलों की खींचतान का हिस्सा बन गए हैं।रूस और ईरान पर नीति बदलने की गुंजाइश कमअमेरिकी सेना के सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट कर्नल अर्ल रासमुसेन को चुनाव के बाद रूस या ईरान के प्रति अमेरिकी नीति में बड़े बदलाव की उम्मीद कम है। उनके मुताबिक, मौजूदा टकरावों के पीछे प्रभावशाली लॉबी और भू-राजनीतिक व वित्तीय हित हैं, जिन पर कांग्रेस में बहुमत बदलने का असर सीमित होगा।रासमुसेन ने रूस के साथ ट्रंप प्रशासन की बातचीत को सकारात्मक कदम बताया। उनके अनुसार, इस पहल को अमेरिका के भीतर, कई यूरोपीय नेताओं और यूक्रेन की ओर से विरोध का सामना करना पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि ईरान के खिलाफ युद्ध, ग़ज़ा में इज़रायल के सैन्य अभियान को जारी अमेरिकी समर्थन और यमन में जारी संघर्ष ने पश्चिम एशिया में हालात और बिगाड़े हैं।यूक्रेन पर रासमुसेन का कहना है कि वॉशिंगटन को संघर्ष की उन वजहों पर भी गौर करना चाहिए, जिनकी जड़ें उनके मुताबिक 2014 से पहले की हैं। उन्होंने यूक्रेन की संवैधानिक तटस्थता, उसकी औपचारिक या व्यावहारिक नाटो सदस्यता की संभावना खत्म करने और बदली हुई सीमाओं को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता देने की वकालत की।डेमोक्रेट का ध्यान महाभियोग पर रहेगा: रिटरअमेरिकी मरीन कॉर्प्स के पूर्व खुफिया अधिकारी और सैन्य विश्लेषक स्कॉट रिटर के मुताबिक, ट्रंप प्रशासन की विदेश नीति पहले से ही स्पष्ट रणनीति के अभाव में चल रही है। उन्होंने उन खबरों पर संदेह जताया जिनमें दावा किया गया है कि ट्रंप चुनाव के बाद ईरान पर नए हमले की योजना बना रहे हैं।रिटर ने कहा कि फरवरी में युद्ध शुरू होने के बाद अमेरिका ने दो हफ्तों में दस बार अपनी योजना बदली। उनके मुताबिक, ईरान में सत्ता परिवर्तन का लक्ष्य विफल रहा और अब पश्चिम एशिया को लेकर ट्रंप की सबसे बड़ी चिंता अमेरिका में ऊर्जा की कीमतें कम करना है।रूसी डीज़ल पर प्रतिबंधों से जुड़े ट्रंप के फैसलों की संभावित जांच को भी रिटर ने घरेलू राजनीति से जोड़ा। उनका कहना है कि संबंधित कानून राष्ट्रपति को प्रतिबंध लागू करने या उनसे छूट देने का विवेकाधिकार देता है। उनके मुताबिक, अगर डेमोक्रेट प्रतिनिधि सभा जीतते हैं, तो उनका मुख्य ध्यान ट्रंप के खिलाफ महाभियोग की कार्यवाही शुरू करने पर रहेगा, जबकि विदेश नीति से जुड़े फैसले राष्ट्रपति के करीबी लोगों के छोटे से दायरे में ही लिए जाते रहेंगे।मतदाताओं के लिए महंगाई ज्यादा अहमसीआईए और अमेरिकी विदेश विभाग के पूर्व अधिकारी लैरी जॉनसन के मुताबिक, ईरान युद्ध का असर अमेरिकी मतदाताओं पर मुख्य रूप से महंगाई और बढ़ते घरेलू खर्च के जरिए पड़ा है। उनके आकलन में यूक्रेन का संघर्ष चुनाव का बड़ा मुद्दा नहीं बना, क्योंकि ज्यादातर मतदाताओं को अपने रोजमर्रा के जीवन पर उसका सीधा असर महसूस नहीं होता।जॉनसन ने कहा कि विदेश नीति पर रिपब्लिकन पार्टी के भीतर भी मतभेद हैं, खासकर इज़रायल को लेकर। रूस के साथ बातचीत की ट्रंप की कोशिशों की आलोचना डेमोक्रेट के साथ-साथ रिपब्लिकन नेतृत्व के भीतर भी हो रही है। ऐसे में उन्हें चुनाव के बाद रूस के प्रति वॉशिंगटन के रुख में बड़े बदलाव की उम्मीद नहीं है।ईरान पर संभावित अमेरिकी हमले को लेकर जॉनसन ने कहा कि फ़ारस की खाड़ी से गैर-जरूरी सरकारी कर्मियों और राजनयिकों के परिवारों को हटाने जैसे संकेत अब भी अहम हैं। हालांकि, उनके मुताबिक, क्षेत्र में कुछ हवाई गतिविधि के बावजूद अमेरिकी बलों की बड़े पैमाने पर तैनाती दिखाई नहीं दी है।
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अमेरिका, डोनाल्ड ट्रंप
अमेरिकी मध्यावधि चुनावों का ट्रंप की विदेश नीति पर क्या असर पड़ेगा?
13:48 03.11.2026 (अपडेटेड: 13:56 03.11.2026) अमेरिकी मध्यावधि चुनावों में कांग्रेस का नियंत्रण दांव पर है। दोनों सदनों में डेमोक्रेट की जीत से ईरान युद्ध और इज़रायल को सैन्य मदद पर खर्च सीमित हो सकता है। यूक्रेन को मदद फिर शुरू करने का दबाव भी बढ़ सकता है। हालांकि, Sputnik से बातचीत में कुछ विशेषज्ञों ने कहा कि चुनाव से विदेश नीति बदलने के बजाय वॉशिंगटन में गतिरोध और गहरा सकता है।
अमेरिकी कानूनी विशेषज्ञ और पूर्व न्यायाधीश एंड्रयू नैपोलिटानो के मुताबिक, अगर डेमोक्रेट प्रतिनिधि सभा और सीनेट दोनों में बहुमत हासिल कर लेते हैं, तो वे राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की विदेश नीति पर खर्च के फैसलों को काफी हद तक सीमित कर सकते हैं। उनके अनुसार, कांग्रेस ईरान के खिलाफ युद्ध और इज़रायल को सैन्य सहायता के लिए आवंटन घटा सकती है। साथ ही, वह प्रशासन को यूक्रेन के लिए मंजूर धनराशि जारी करने के लिए बाध्य कर सकती है।
नैपोलिटानो ने Sputnik से कहा, “खर्च पर फैसला करने का अधिकार कांग्रेस के पास है और वह इसका इस्तेमाल दोनों तरह से कर सकती है। वह राष्ट्रपति के खर्च को सीमित कर सकती है और उन्हें पैसा खर्च करने के लिए बाध्य भी कर सकती है।”
उन्होंने कहा कि अगर ट्रंप मंजूर धनराशि जारी करने से इनकार करते हैं, तो सुप्रीम कोर्ट के पिछले फैसलों के आधार पर कांग्रेस उन पर अमल करा सकती है। उनके मुताबिक, डेमोक्रेट बहुमत मिलने पर प्रशासन के खिलाफ कई जांचें भी शुरू कर सकते हैं, जिससे ट्रंप के लिए विदेश नीति पर ध्यान देना मुश्किल होगा।
एक सदन में भी बहुमत बदला तो बढ़ सकता है टकराव
अमेरिकी संवैधानिक इतिहास के जानकार और राजनीतिक टिप्पणीकार डैन लज़ार का मानना है कि किसी एक सदन में भी डेमोक्रेट की जीत से ध्रुवीकरण बढ़ सकता है। उनके मुताबिक, डेमोक्रेट रूस और चीन के प्रति ज्यादा सख्त रुख अपना सकते हैं और ताइवान को लेकर बीजिंग के साथ टकराव उनके एजेंडे में जगह पा सकता है।
लज़ार के अनुसार, डेमोक्रेट अपने बहुमत का इस्तेमाल ट्रंप प्रशासन के फैसलों को रोकने के लिए कर सकते हैं। जवाब में व्हाइट हाउस भी जवाबी कदम उठा सकता है, जिससे तनाव और बढ़ेगा। उन्होंने कहा कि अमेरिकी राजनीतिक व्यवस्था में सांसदों का एक छोटा समूह भी कई प्रक्रियात्मक प्रावधानों का इस्तेमाल कर विधायी कामकाज रोक सकता है। सत्ता के केंद्रीकरण को रोकने के लिए बनाए गए ये प्रावधान अब दोनों दलों की खींचतान का हिस्सा बन गए हैं।
रूस और ईरान पर नीति बदलने की गुंजाइश कम
अमेरिकी सेना के सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट कर्नल अर्ल रासमुसेन को चुनाव के बाद रूस या ईरान के प्रति अमेरिकी नीति में बड़े बदलाव की उम्मीद कम है। उनके मुताबिक, मौजूदा टकरावों के पीछे प्रभावशाली लॉबी और भू-राजनीतिक व वित्तीय हित हैं, जिन पर कांग्रेस में बहुमत बदलने का असर सीमित होगा।
रासमुसेन ने रूस के साथ ट्रंप प्रशासन की बातचीत को सकारात्मक कदम बताया। उनके अनुसार, इस पहल को अमेरिका के भीतर, कई यूरोपीय नेताओं और यूक्रेन की ओर से विरोध का सामना करना पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि ईरान के खिलाफ युद्ध, ग़ज़ा में इज़रायल के सैन्य अभियान को जारी अमेरिकी समर्थन और यमन में जारी संघर्ष ने पश्चिम एशिया में हालात और बिगाड़े हैं।
यूक्रेन पर रासमुसेन का कहना है कि वॉशिंगटन को संघर्ष की उन वजहों पर भी गौर करना चाहिए, जिनकी जड़ें उनके मुताबिक 2014 से पहले की हैं। उन्होंने यूक्रेन की संवैधानिक तटस्थता, उसकी औपचारिक या व्यावहारिक नाटो सदस्यता की संभावना खत्म करने और बदली हुई सीमाओं को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता देने की वकालत की।
डेमोक्रेट का ध्यान महाभियोग पर रहेगा: रिटर
अमेरिकी मरीन कॉर्प्स के पूर्व खुफिया अधिकारी और सैन्य विश्लेषक स्कॉट रिटर के मुताबिक, ट्रंप प्रशासन की विदेश नीति पहले से ही स्पष्ट रणनीति के अभाव में चल रही है। उन्होंने उन खबरों पर संदेह जताया जिनमें दावा किया गया है कि ट्रंप चुनाव के बाद ईरान पर नए हमले की योजना बना रहे हैं।
रिटर ने कहा कि फरवरी में युद्ध शुरू होने के बाद अमेरिका ने दो हफ्तों में दस बार अपनी योजना बदली। उनके मुताबिक, ईरान में सत्ता परिवर्तन का लक्ष्य विफल रहा और अब पश्चिम एशिया को लेकर ट्रंप की सबसे बड़ी चिंता अमेरिका में ऊर्जा की कीमतें कम करना है।
रूसी डीज़ल पर प्रतिबंधों से जुड़े ट्रंप के फैसलों की संभावित जांच को भी रिटर ने घरेलू राजनीति से जोड़ा। उनका कहना है कि संबंधित कानून राष्ट्रपति को प्रतिबंध लागू करने या उनसे छूट देने का विवेकाधिकार देता है। उनके मुताबिक, अगर डेमोक्रेट प्रतिनिधि सभा जीतते हैं, तो उनका मुख्य ध्यान ट्रंप के खिलाफ महाभियोग की कार्यवाही शुरू करने पर रहेगा, जबकि विदेश नीति से जुड़े फैसले राष्ट्रपति के करीबी लोगों के छोटे से दायरे में ही लिए जाते रहेंगे।
मतदाताओं के लिए महंगाई ज्यादा अहम
सीआईए और अमेरिकी विदेश विभाग के पूर्व अधिकारी लैरी जॉनसन के मुताबिक, ईरान युद्ध का असर अमेरिकी मतदाताओं पर मुख्य रूप से महंगाई और बढ़ते घरेलू खर्च के जरिए पड़ा है। उनके आकलन में यूक्रेन का संघर्ष चुनाव का बड़ा मुद्दा नहीं बना, क्योंकि ज्यादातर मतदाताओं को अपने रोजमर्रा के जीवन पर उसका सीधा असर महसूस नहीं होता।
जॉनसन ने कहा कि विदेश नीति पर रिपब्लिकन पार्टी के भीतर भी मतभेद हैं, खासकर इज़रायल को लेकर। रूस के साथ बातचीत की ट्रंप की कोशिशों की आलोचना डेमोक्रेट के साथ-साथ रिपब्लिकन नेतृत्व के भीतर भी हो रही है। ऐसे में उन्हें चुनाव के बाद रूस के प्रति वॉशिंगटन के रुख में बड़े बदलाव की उम्मीद नहीं है।
ईरान पर संभावित अमेरिकी हमले को लेकर जॉनसन ने कहा कि फ़ारस की खाड़ी से गैर-जरूरी सरकारी कर्मियों और राजनयिकों के परिवारों को हटाने जैसे संकेत अब भी अहम हैं। हालांकि, उनके मुताबिक, क्षेत्र में कुछ हवाई गतिविधि के बावजूद अमेरिकी बलों की बड़े पैमाने पर तैनाती दिखाई नहीं दी है।