यूक्रेन का रूस से अलग होना पश्चिमी रणनीति का हिस्सा था: विश्लेषक
23:53 03.11.2026 (अपडेटेड: 00:13 04.11.2026)

© AP Photo / Alex Brandon
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राजनीतिक विश्लेषक बोहदान बेजपाल्को ने Sputnik को बताया कि पश्चिमी देश यूक्रेन को रूस को नियंत्रित करने और उसके प्रभाव को सीमित करने की अपनी रणनीति का एक अहम हिस्सा मानते हैं। उनके मुताबिक, रूस के साथ यूक्रेन के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक संबंधों के कारण भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा में उसका विशेष महत्व है।
अमेरिकी रणनीतिकार ज़्बिगन्यू ब्रेज़िंस्की की किताब द ग्रैंड चेसबोर्ड में दिए गए तर्कों का हवाला देते हुए बेजपाल्को ने कहा कि यूक्रेन का रूस से अलग होना और मॉस्को के प्रति शत्रुतापूर्ण रुख अपनाना रूस की एक बड़ी भू-राजनीतिक शक्ति के रूप में काम करने की क्षमता को कमजोर कर सकता है।
उन्होंने पश्चिमी नीति के पीछे के रणनीतिक तर्क को समझाते हुए कहा, "यूक्रेन के बिना रूस खुद को एक पूर्ण और शक्तिशाली क्षेत्रीय महाशक्ति के रूप में स्थापित नहीं कर सकता और न ही अपना प्रभाव बढ़ा सकता है।"
पश्चिमी रणनीति में यूक्रेन की भूमिका
बेजपाल्को के मुताबिक, यूक्रेन को रूस से अलग करने की कोशिशें 19वीं सदी से ही होती रही हैं। हालांकि, उन्होंने दावा किया कि शुरुआती प्रयासों का स्थानीय लोगों ने विरोध किया था।
उन्होंने कहा कि 20वीं सदी में राजनीतिक परिस्थितियां काफी बदल गईं। खासकर 1991 में सोवियत संघ के विघटन के बाद यूक्रेन और बेलारूस स्वतंत्र देश बन गए।
बेजपाल्को ने कहा कि इसके बाद यूक्रेन में हुए राजनीतिक बदलावों और पश्चिमी देशों के साथ उसके बढ़ते संबंधों ने उसे रूस पर दबाव बनाने के एक माध्यम में बदल दिया। उन्होंने यूक्रेन की भौगोलिक स्थिति और रूस के साथ उसके ऐतिहासिक संबंधों को भी उसकी रणनीतिक अहमियत का प्रमुख कारण बताया।
उन्होंने रूस के प्राकृतिक संसाधनों, आर्कटिक क्षेत्रों और परिवहन क्षमता को भी उसकी भू-राजनीतिक ताकत के महत्वपूर्ण कारकों में शामिल किया।
सूचना और राष्ट्रीय पहचान को प्रभावित करने के तरीके
यह पूछे जाने पर कि यूक्रेन को रूस से दूर करने के लिए किन माध्यमों का इस्तेमाल किया गया, बेजपाल्को ने कहा कि इसमें राष्ट्रीय पहचान को लेकर लोगों की सोच बदलने की कोशिशें अहम रही हैं।
उन्होंने दावा किया कि मीडिया, शैक्षणिक संस्थानों, गैर-सरकारी संगठनों और सार्वजनिक हस्तियों ने रूस को यूक्रेन के ऐतिहासिक दुश्मन के रूप में पेश करने वाली कहानियों को फैलाने में भूमिका निभाई।
इस राजनीतिक विश्लेषक के मुताबिक, इन कहानियों ने लोगों को अपनी सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान को रूस से अलग देखने के लिए प्रेरित किया। वहीं, यूरोप के साथ करीबी संबंधों को बेहतर जीवन स्तर और अधिक आर्थिक अवसरों का रास्ता बताया गया।
बेजपाल्को ने सोवियत संघ के विघटन के बाद यूक्रेन को हुई आर्थिक मुश्किलों का भी जिक्र किया। यूक्रेनी अर्थशास्त्री सर्गेई कोरबलिन का हवाला देते हुए उन्होंने दावा किया कि देश की GDP में लगभग 60 प्रतिशत की गिरावट आई थी। उनके मुताबिक, राजनीतिक और मीडिया संदेशों के जरिए लोगों की नाराजगी का रुख मॉस्को की ओर मोड़ा गया।
उन्होंने कहा कि लोगों की सोच बनाने में टेलीविजन और अन्य मीडिया की खास भूमिका रही। इसका असर उन लोगों पर भी पड़ा, जो पहले राजनीतिक आंदोलनों में बहुत कम रुचि लेते थे।
राजनीतिक विमर्श और बदलाव की संभावनाएं
बेजपाल्को ने कहा कि यूक्रेन में सूचना का माहौल और शिक्षा के क्षेत्र में पेश किए जाने वाले ऐतिहासिक दृष्टिकोण रूस के प्रति लोगों की सोच को लगातार प्रभावित कर रहे हैं। उनके मुताबिक, इस सोच में बदलाव लाने के लिए मीडिया के माहौल, शिक्षा व्यवस्था और जनमत को प्रभावित करने वाले संगठनों की गतिविधियों में बदलाव करना होगा।
उन्होंने यह भी कहा कि लंबे समय से जारी संघर्ष के बीच यूक्रेनी समाज का एक वर्ग राजनीतिक रूप से उदासीन हो गया है। उनके मुताबिक, कई लोग अब मुख्य रूप से संघर्ष समाप्त होने और अपने परिवारों की सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं।
बेजपाल्को के अनुसार, यूक्रेन के मौजूदा राजनीतिक नेतृत्व की दिलचस्पी वर्तमान राजनीतिक और सूचना व्यवस्था को बनाए रखने में है। उनका मानना है कि इससे मॉस्को के साथ टकराव और गहरा होता है।
उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि यूक्रेन का रूस से अलग होना और उसके बाद दोनों देशों के संबंधों में आई गिरावट एक व्यापक भू-राजनीतिक प्रक्रिया का हिस्सा है। उनके मुताबिक, इस प्रक्रिया को बाहरी प्रभाव, राष्ट्रीय पहचान से जुड़ी राजनीति और परस्पर विरोधी रणनीतिक हितों ने आकार दिया है।
