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तालिबान को मान्यता दिए बगैर भारत अफगानिस्तान में रणनीतिक फायदे के हिसाब से काम करता है: विशेषज्ञ

भारत ने कुछ दिन पहले ही 40,000 लीटर मैलाथियान, एक शक्तिशाली कीटनाशक की आपूर्ति करके अफगानिस्तान को एक महत्वपूर्ण जीवनरेखा प्रदान की है। इससे पहले भी कई मौकों पर भारत ने अफगानिस्तान को मानवीय सहायता प्रदान की थी।
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भारत की ओर से जारी सहायता को भारतीय विशेषज्ञ भारत और अफगानिस्तान के लोगों के बीच पुराने संबंधों का ही एक रूप मानते हैं और इसे तालिबान* की सरकार की मान्यता से अलग रखते हैं।
भारत और तालिबान के भविष्य के रिश्तों के संदर्भ में जानकारी प्राप्त करने के लिए Sputnik India ने MP-IDSA नई दिल्ली में अफगानिस्तान मामलों के जानकार वाले रिसर्च फेलो विशाल चंद्रा से बात की।

"हम किसी विशेष घटनाक्रम को अलग करके नहीं देख सकते। हमें इंडो अफगान के पूरे पहलू को अपनाना होगा, क्योंकि जब हम इंडो अफगान कहते हैं, तो हम यहां एक व्यापक संदर्भ को देख रहे होते हैं। इसलिए हमारा संबंध सदियों पुराना है| पिछले सात दशकों में, भारत काबुल में सरकार और अफगानिस्तान के लोगों के साथ काम कर रहा है। यह कभी भी एक राज्य से दूसरे राज्य के संबंधों के बारे में नहीं था। हमारा रिश्ता एक राज्य से दूसरे राज्य के रिश्ते से आगे बढ़ गया," चंद्रा कहते हैं।

चंद्रा के अनुसार अफगानिस्तान में शासन परिवर्तन थे और वे अक्सर हिंसक थे और बाहर से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष हस्तक्षेप के परिणाम थे, लेकिन भारत अफगानिस्तान और उसके लोगों के साथ अपने जुड़ाव को बनाए रखने में काफी हद तक सफल रहा है।
अफगानिस्तान के लोगों को मानवीय सहायता, लगभग 50,000 मीट्रिक टन से अधिक गेहूं और फिर चिकित्सा सहायता के कई प्रेषण प्रदान करके भारत ने 2021 में तालिबान द्वारा सत्ता में आने के बाद भी आर्थिक राजनीतिक संभावनाओं जारी रखने का प्रयास किया है। साथ ही दोनों देशों के बीच व्यापार होता रहा है।

"अगस्त 2023 में ICCR ने अफगान छात्रों के लिए हजारों ऑनलाइन छात्रवृत्ति की घोषणा की। इसलिए भारत अफगानिस्तान के साथ जुड़े रहने के लिए प्रतिबद्ध है। और अगर तालिबान है, तो वे भी संकेत भेज रहे हैं कि वे उनके साथ संबंध रखना चाहेंगे। पिछले ढाई वर्षों में भारत और तालिबान सरकार के बीच एक कामकाजी संबंध विकसित हुआ है। और भारत ने काबुल में अपने दूतावास में अपनी तकनीकी टीम स्थापित की है। इसलिए कुछ प्रयास जारी हैं और पहले भी बैठकें हो चुकी हैं," चंद्रा ने बताया।

निकट भविष्य में तालिबान सरकार के साथ औपचारिक द्विपक्षीय संबंध स्थापित होने की संभावना पर चंद्रा ने Sputnik India को बताया कि "मुझे लगता है कि हमारी स्थिति बिल्कुल स्पष्ट है, भारतीय विदेश मंत्रालय ने यह स्पष्ट कर दिया है कि हम काबुल में अपनी उपस्थिति को राजदूत के स्तर तक नहीं बढ़ाने जा रहे हैं। हम वहां कोई राजदूत नहीं भेजने जा रहे हैं।"
अभी तक किसी भी देश ने काबुल में तालिबान के अधिकार को स्वीकार नहीं किया है। यहां तक कि ऐसे देश भी जिन्होंने 1990 के दशक में तालिबान शासन को स्वीकार किया था जैसे कि पाकिस्तान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात।
हालांकि अफगानिस्तान के साथ भारत के संबंध कायम रखने के पीछे राष्ट्रीय सुरक्षा की चिंताएँ महत्वपूर्ण हैं। भारत किसी भी सूरत में आतंकवादी घटनाओं या आतंकवादी संघठनों के अफगानिस्तान में विस्तार को देखना नहीं चाहेगा।

"अल कायदा** और इस्लामिक स्टेट खुरासान** दोनों ही इस क्षेत्र से रंगरूटों को आकर्षित करने के लिए प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं। मुझे लगता है कि कहीं न कहीं हमें इस बात पर ध्यान देने की जरूरत है कि इस्लामवादी परिदृश्य कैसे विकसित हो रहा है, और शायद यही वह जगह है जहां भारत के पास उपस्थिति रखने और अफगानिस्तान के अंदर हो रहे आंतरिक संघर्ष पर नजर रखने की जरूरत है," चंद्रा ने Sputnik India से कहा।

*तालिबान संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंधों के अधीन है।
**आतंकवादी गतिविधियों के कारण रूस और अन्य देशों में प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन।
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