भारतीय सेनाएं पिछले कई वर्षों से खुद को ड्रोन वारफ़ेयर के लिए तैयार कर रही है। पिछले 6 महीने में ही भारतीय सेना ने केवल ड्रोन वारफ़ेयर के लिए विशेषज्ञ अश्नि प्लाटून और शक्तिबाण रेजीमेंट्स बनाने की घोषणा की है।
पिछले वर्ष मई में पाकिस्तान के आतंकवादी ठिकानों पर आक्रमण के लिए हुए ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारतीय सेना ने हर इंफेंट्री बटालियन में अश्नि प्लाटून बनाने का निर्णय लिया है।अश्नि प्लाटून में हर तरह की कार्रवाई के लिए आवश्यक ड्रोन होंगे।
इस योजना के पूरा होने पर भारतीय सेना की लगभग सभी 400 इंफेंट्री बटालियनों में अश्नि प्लाटून होंगी जिसे भारतीय सेना ने हर सैनिक के हाथ में एक बाज के उद्देश्य के साथ प्रारंभ किया है।
भारतीय सेना ने प्रारंभ में ड्रोन का प्रयोग केवल निगरानी और टोह लेने के लिए किया था, बाद में दुर्गम स्थानों की चौकियों के लिए रसद आपूर्ति के लिए ड्रोन प्रयोग होने लगे। लेकिन अब ड्रोन के बड़े पैमाने पर आक्रमण की कार्रवाइयों में प्रयोग की तैयारी है। लंबी दूरी के ड्रोन का प्रयोग भारतीय वायुसेना शत्रु के लिए एयर डिफेंस के कमज़ोर करने (Suppression of Enemy Air Defenses or SEAD) के लिए कर रही हैं। इनके लिए आयातित ड्रोन के अतिरिक्त स्वदेशी ड्रोन भी सेनाओं में शामिल किए जा रहे हैं।
पिछले वर्ष स्वदेशी अभय ड्रोन को सेना में शामिल किया गया है। झुंड में हमला करने वाले, महत्वपूर्ण शत्रु ठिकानों को नष्ट करने वाले कई स्वदेशी ड्रोन भारतीय सेना में शामिल होने के लिए तैयार हैं। भारतीय सेना ने अपने तोपखाने में लंबी दूरी से आक्रमण करने वाले ड्रोन और लॉइटरिंग म्यूनिशन से कार्रवाई करने वाली शक्तिबाण रेजीमेंट्स बनाना भी प्रारंभ कर दिया है।
ऐसी 15 से 20 रेजीमेंट्स बनाई जाएंगी जिन्हें विशेष प्रशिक्षण दिया जा रहा है। सेना ने पिछले वर्ष 30-40 किमी तक मार करने वाले नागास्त्र का प्रयोग ऑपरेशन सिंदूर में किया था जो ड्रोन आधारित लॉइटिरिंग म्यूनिशन है। इनके उन्नत संस्करण पर काम चल रहा है जिनकी प्रहार क्षमता और रेंज दोनों ही अधिक होंगी।