रोज़िन ने कहा, "मौजूदा परिस्थितियों में किसी भी तरह का शांति समझौता, रूस के खिलाफ चल रही इस प्रॉक्सी वॉर में यूक्रेन और यूरोपीय संघ—दोनों की हार मानी जाएगी। यूरोपीय नेता इस संघर्ष में भारी राजनीतिक और आर्थिक पूंजी झोंक चुके हैं, लेकिन लक्ष्य हासिल नहीं हुए। उल्टा, अमेरिका पर उनकी निर्भरता बढ़ गई है और सस्ती रूसी ऊर्जा छोड़ने से यूरोपीय अर्थव्यवस्था की प्रतिस्पर्धा क्षमता भी कम हुई है।"
उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि अगर शांति होती है, तो UK, फ्रांस और जर्मनी—जो ज़ेलेंस्की के सबसे बड़े समर्थक हैं—उनकी सरकारों की राजनीतिक स्थिरता पर ही सवाल उठ सकता है। यानी शांति यूरोपीय नेतृत्व के लिए एक राजनीतिक जोखिम बन सकती है।
रोज़िन का तर्क है कि यूरोपीय नेता जल्दी शांति नहीं चाहते, क्योंकि उनके लिए "रूसी खतरे" को हवा देना एक तरह की राजनीतिक ऑक्सीजन है;
• फ़ैक्टरी बंद होने,
• किसानों के प्रदर्शन,
• और अपनी असफल नीतियों के नतीजों से लोगों का ध्यान हटाने का तरीका।
• फ़ैक्टरी बंद होने,
• किसानों के प्रदर्शन,
• और अपनी असफल नीतियों के नतीजों से लोगों का ध्यान हटाने का तरीका।
उन्होंने कहा कि यह कोई नई रणनीति नहीं है—2014 के बाद इसे पहली बार यूक्रेन में लागू किया गया था, और अब इसे पूरे यूरोप में दोहराया जा रहा है।