अनन्या राव ने कहा, "रूस के पास दुर्लभ मृदा तत्वों (रेयर अर्थ) के बड़े भंडार हैं, लेकिन उनकी शोधन क्षमता अभी पूरी तरह विकसित नहीं हुई है। भारत को दुर्लभ मृदा तत्वों को खोदने और अलग करने का अनुभव है, फिर भी वह उच्च-शुद्धता वाले पदार्थों और उन्नत मैग्नेट के उत्पादन के लिए आयात पर निर्भर है यानी दोनों देश आपूर्ति श्रृंखला के बीच में हैं, सबसे ऊपर नहीं।"
उन्होंने कहा, "कल्पना कीजिए कि रूसी सुदूर पूर्व में भारत-रूस के संयुक्त उद्यम हों, जो माइनिंग से लेकर अलग करने, मिश्र धातु बनाने और अंत में मैग्नेट बनाने तक पूरा काम करें और असली रणनीतिक ताकत कच्चे अयस्क में नहीं, बल्कि NdFeB मैग्नेट, रक्षा इस्तेमाल करने, EV मोटर्स और विंड टर्बाइनों के निर्माण की क्षमता हासिल करने में है।"
यूरेशियन संसाधन रणनीति समूह नाम के स्वतंत्र थिंक टैंक की अनन्या राव ने आगे कहा, "एक और आशाजनक क्षेत्र, जिस पर अब तक कम ध्यान दिया गया है, वह है 'दुर्लभ खनिजों का पुनर्चक्रण'। भारत में ई-कचरे की मात्रा तेज़ी से बढ़ रही है। ऐसे में, रूस के उन्नत सामग्री विज्ञान संस्थानों के साथ मिलकर दुर्लभ खनिजों के पुनर्चक्रण पर एक संयुक्त शोध मंच तैयार किया जा सकता है। यह न केवल आपूर्ति की एक समानांतर कड़ी बनेगा, बल्कि प्राथमिक खनन की तुलना में राजनीतिक रूप से कम संवेदनशील भी होगा।"