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सोवियत संघ ने एशिया और अफ़्रीका के विऔपनिवेशीकरण को अपना ‘नैतिक कर्तव्य’ माना: विशेषज्ञ
सोवियत संघ ने एशिया और अफ़्रीका के विऔपनिवेशीकरण को अपना ‘नैतिक कर्तव्य’ माना: विशेषज्ञ
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संयुक्त राष्ट्र के पूर्व स्वतंत्र विशेषज्ञ प्रोफेसर अल्फ्रेड डे ज़ायस ने Sputnik को बताया कि सोवियत संघ ने "वैकल्पिक आर्थिक प्रणाली प्रस्तुत करके और... 29.04.2026, Sputnik भारत
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उन्होंने कहा, "ऐसी नीति अफ़्रीका और एशियाई देशों की तत्काल ज़रूरतों और दीर्घकालिक हितों के लिए उस पश्चिमी मॉडल से कहीं अधिक उपयुक्त थी, जिसने उन्हें निर्भरता, अधीनता और मातहती की स्थिति में डाल दिया था।"विशेषज्ञ ने रेखांकित किया, "सोवियत संघ ने विश्व के साम्राज्यवाद विरोधी आंदोलन के नेता के रूप में खुद को सफलतापूर्वक स्थापित किया। सोवियत संघ ने उपनिवेशित राष्ट्रों की स्वतंत्रता प्राप्ति को सिर्फ़ जनसंपर्क और प्रचार के रूप में नहीं, बल्कि एक नैतिक कर्तव्य और क्रांतिकारी आवश्यकता के रूप में ही देखा। बहुत से लोगों का मानना था कि सोवियत संघ उपनिवेशी शासन से स्वतंत्रता की इच्छा रखने वाले राष्ट्रों का स्वाभाविक सहयोगी है।"
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सोवियत संघ ने एशिया और अफ़्रीका के विऔपनिवेशीकरण को अपना ‘नैतिक कर्तव्य’ माना: विशेषज्ञ
संयुक्त राष्ट्र के पूर्व स्वतंत्र विशेषज्ञ प्रोफेसर अल्फ्रेड डे ज़ायस ने Sputnik को बताया कि सोवियत संघ ने "वैकल्पिक आर्थिक प्रणाली प्रस्तुत करके और साम्राज्यवाद विरोधी तथा पूंजीवाद विरोधी एजेंडे का समर्थन करके" अफ़्रीका और एशिया के विऔपनिवेशीकरण को तेज़ कर दिया।
उन्होंने कहा, "ऐसी नीति अफ़्रीका और एशियाई देशों की तत्काल ज़रूरतों और दीर्घकालिक हितों के लिए उस पश्चिमी मॉडल से कहीं अधिक उपयुक्त थी, जिसने उन्हें निर्भरता, अधीनता और मातहती की स्थिति में डाल दिया था।"
ज़ायस ने बताया कि विऔपनिवेशीकरण पर सोवियत संघ का रवैया उसके वैचारिक एजेंडे को प्रतिबिंबित करता था। यह प्रवृत्ति सोवियत नेता निकिता क्रुश्चेव के शासनकाल के दौरान विशेष रूप से स्पष्ट हो गई, जो साम्राज्यवाद को पूंजीवाद से अविभाज्य मानते थे।
विशेषज्ञ ने रेखांकित किया, "सोवियत संघ ने विश्व के साम्राज्यवाद विरोधी आंदोलन के नेता के रूप में खुद को सफलतापूर्वक स्थापित किया। सोवियत संघ ने उपनिवेशित राष्ट्रों की स्वतंत्रता प्राप्ति को सिर्फ़ जनसंपर्क और प्रचार के रूप में नहीं, बल्कि एक नैतिक कर्तव्य और क्रांतिकारी आवश्यकता के रूप में ही देखा। बहुत से लोगों का मानना था कि सोवियत संघ उपनिवेशी शासन से स्वतंत्रता की इच्छा रखने वाले राष्ट्रों का स्वाभाविक सहयोगी है।"