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चीन अगले 5 वर्षों के भीतर परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में अमेरिका को पीछे छोड़ देगा: रिपोर्ट

© ADEK BERRYWomen stand next to a model of a nuclear thermal reactor (C) during the 26th China Beijing International High-Tech Exhibition at the National Convention Center in Beijing on July 16, 2024. (Photo by ADEK BERRY / AFP)
Women stand next to a model of a nuclear thermal reactor (C) during the 26th China Beijing International High-Tech Exhibition at the National Convention Center in Beijing on July 16, 2024. (Photo by ADEK BERRY / AFP) - Sputnik भारत, 1920, 10.06.2026
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गावेकल टेक्नोलॉजीज के एक नए विश्लेषण के अनुसार, चीन अगले पांच वर्षों के भीतर दुनिया के अग्रणी परमाणु ऊर्जा उत्पादक के रूप में संयुक्त राज्य अमेरिका को पीछे छोड़ने की राह पर है, जो कृत्रिम बुद्धिमत्ता के चलते बढ़ती बिजली की मांग और होर्मुज़ जलडमरूमध्य की नाकाबंदी से प्रेरित है।
जबकि संयुक्त राज्य अमेरिका अभी भी दुनिया के सबसे बड़े परमाणु रिएक्टरों का संचालन करता है, चीन वर्तमान में वैश्विक स्तर पर निर्माणाधीन सभी रिएक्टरों का लगभग आधा हिस्सा रखता है।
गावेकल टेक फर्म के मुख्य न्यू एनर्जी विश्लेषक डेमियन मा ने लिखा, "चीन एक बड़े अंतर से साल 2035 तक दुनिया के सबसे गतिशील और महत्वपूर्ण परमाणु उद्योग का केंद्र बन जाएगा।"

एआई और ऊर्जा सुरक्षा चीन के परमाणु प्रयास को बढ़ावा देते हैं

एआई डेटा सेंटरों के तेजी से विस्तार ने विश्वसनीय, कार्बन-मुक्त बेसलोड बिजली की तत्काल आवश्यकता पैदा कर दी है। उसी समय अमेरिका-ईरान युद्ध के चलते होर्मुज़ जलडमरूमध्य के लंबे समय तक बंद रहने से वैश्विक ऊर्जा बाजार संकट का सामना कर रहे हैं जिससे ऊर्जा सुरक्षा पर चिंताएं पैदा हुईं हैं। बीजिंग ने परमाणु ऊर्जा को एक रणनीतिक समाधान के रूप में पहचाना है।
अपनी नवीनतम पांच-वर्षीय योजना के तहत, चीन ने 2030 तक 110 गीगावाट स्थापित परमाणु क्षमता का लक्ष्य रखा है। राज्य प्रसारक सीसीटीवी के अनुसार, देश में पहले से ही 36 नए रिएक्टर निर्माणाधीन हैं।

अमेरिकी ठहराव

इसके विपरीत, संयुक्त राज्य अमेरिका अपने परमाणु बेड़े को बढ़ाने के लिए संघर्ष कर रहा है। अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन की रिपोर्ट के अनुसार, 1996 के बाद से देश में केवल तीन नए रिएक्टर चालू हुए हैं, जो दशकों के स्थिर विकास को दर्शाता है।
एक तरफ जहां वाशिंगटन का पूरा ध्यान मध्य पूर्व के सैन्य संघर्षों पर केंद्रित है, वहीं दूसरी तरफ बीजिंग शांति से भविष्य के ऊर्जा बुनियादी ढांचे को तैयार करने में जुटा है। इन दोनों महाशक्तियों के बीच का अंतर कम होने के बजाय लगातार बढ़ता ही जा रहा है।
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