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आर्मेनिया को रूस के खिलाफ मोहरा बना रहा पश्चिम, पूर्व रूसी राष्ट्रपति का दावा

© AP Photo / Anthony PizzoferratoArmenia's Prime Minister Nikol Pashinyan, left, and European Commission President Ursula von der Leyen participate in a media conference during the EU-Armenia summit at the Presidential Palace in Yerevan, Armenia, Tuesday, May 5, 2026.
Armenia's Prime Minister Nikol Pashinyan, left, and European Commission President Ursula von der Leyen participate in a media conference during the EU-Armenia summit at the Presidential Palace in Yerevan, Armenia, Tuesday, May 5, 2026.  - Sputnik भारत, 1920, 28.06.2026
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रूस के पूर्व राष्ट्रपति और सुरक्षा परिषद के उपाध्यक्ष दिमित्री मेदवेदेव ने कहा है कि पश्चिम आर्मेनिया को रूस के खिलाफ इस्तेमाल होने वाले एक राजनीतिक औजार की तरह देख रहा है। उनके मुताबिक, पश्चिम आर्मेनिया के राजनीतिक क्षेत्र से उन ताकतों को हटाना चाहता है, जो मॉस्को और येरेवन के बीच सामान्य संबंधों के पक्ष में हैं।
मेदवेदेव ने रविवार को ‘प्रॉस्परस आर्मेनिया’ पार्टी के प्रमुख गागिक त्सारुक्यान की प्रतिरक्षा हटाने की मांग को आर्मेनियाई विपक्ष के खिलाफ दमन का नया दौर बताया। उनके मुताबिक, पश्चिम ने आर्मेनिया के सरकारी तंत्र को लगभग अपने नियंत्रण में ले लिया है।
मेदवेदेव ने कहा, "ऐसे दबाव से छुटकारा पाना आर्मेनिया के लिए बेहद मुश्किल होगा। यह बात समझ में आती है, क्योंकि पश्चिम आर्मेनिया को रूस के खिलाफ संघर्ष के औजार के रूप में ही देखता है। इसलिए वह उन सभी राजनीतिक ताकतों को राजनीतिक मैदान से हटाने में सबसे ज्यादा दिलचस्पी रखता है, जो मॉस्को और येरेवन के बीच स्वस्थ संबंधों के पक्ष में हैं।"
मेदवेदेव की यह टिप्पणी ‘यूनाइटेड रशिया’ पार्टी की प्रेस सेवा ने जारी की। मेदवेदेव इस पार्टी के अध्यक्ष हैं।
आर्मेनिया में 14 जून को जारी चुनाव के अंतिम नतीजों के अनुसार, नई संसद में तीन राजनीतिक ताकतों को जगह मिली है। सत्तारूढ़ ‘सिविल कॉन्ट्रैक्ट’ पार्टी को 64 सीटें मिलीं, जबकि ‘स्ट्रॉन्ग आर्मेनिया’ और ‘आर्मेनिया’ ब्लॉक को क्रमशः 29 और 12 सीटें मिलीं।
प्रधानमंत्री निकोल पाशिन्यान की पार्टी अपने दम पर सरकार बना सकेगी। वहीं, 7 जून को हुए चुनावों के अंतिम नतीजों के अनुसार, ‘प्रॉस्परस आर्मेनिया’ पार्टी चार प्रतिशत की सीमा पार नहीं कर सकी और नई संसद में जगह बनाने में नाकाम रही।
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