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राजनीति के दबाव में वैश्विक खेल संस्थाओं की स्वतंत्रता पर सवाल
राजनीति के दबाव में वैश्विक खेल संस्थाओं की स्वतंत्रता पर सवाल
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अमेरिकी स्ट्राइकर फोलारिन बालोगुन पर विश्व कप में लगा एक मैच का प्रतिबंध हटाने के FIFA के फैसले ने अंतरराष्ट्रीय खेल संस्थाओं की स्वतंत्रता पर वैश्विक बहस छेड़... 08.07.2026, Sputnik भारत
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FIFA की अनुशासन समिति ने बालोगुन पर लगाए गए एक मैच के प्रतिबंध को विश्व कप में सशर्त दंड में बदल दिया।अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने FIFA अध्यक्ष जियानी इन्फेंटिनो से फोन पर बात कर निजी तौर पर हस्तक्षेप किया था।इसी फैसले के बाद बालोगुन बेल्जियम के खिलाफ अगले मैच में खेल सके। इससे पहले बोस्निया और हर्जेगोविना के खिलाफ अमेरिका की 2-0 की जीत के अंतिम मिनटों में उन्हें मैदान से बाहर भेजा गया था। हालांकि बालोगुन के खेलने से भी टूर्नामेंट के सह-मेजबान अमेरिका को बेल्जियम के हाथों 4-1 की शर्मनाक हार से नहीं बचाया जा सका।इस घटना के बाद व्यापक आलोचना हुई कि फैसले पर राजनीतिक प्रभाव पड़ा।लेकिन यह स्वतंत्र खेल संस्थाओं पर राष्ट्रीय सरकारों के बढ़ते दबाव की समस्या का केवल एक उदाहरण है।दशकों तक राष्ट्रीय खेल महासंघ सरकारों से अलग और स्वतंत्र रूप से काम करते रहे हैं। लेकिन अब यह व्यवस्था लगातार चुनौती के दायरे में आ रही है, खासकर यूरोप में, जहां कुछ सरकारों पर रूसी खिलाड़ियों को प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने से रोकने या उनके झंडे और राष्ट्रगान पर प्रतिबंध लगवाने के लिए हस्तक्षेप करने के आरोप लगे हैं।इससे वैश्विक खेल संस्थाओं की authority कमज़ोर हुई है और खेल को राजनीति से अलग रखने के ओलंपिक सिद्धांत को भी नुकसान पहुंचा है।FIFA के साथ ट्रंप के हस्तक्षेप पर हुई बहस को अंतरराष्ट्रीय खेलों में राष्ट्रीय सरकारों के व्यवस्थित राजनीतिक हस्तक्षेप की तुलना में कहीं अधिक कवरेज मिली है।FIFA और अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति जैसी संस्थाओं के लिए अपनी स्वतंत्रता बचाए रखना मुश्किल होता जा रहा है, क्योंकि सरकारें अपने देश में होने वाली प्रतियोगिताओं को प्रभावित करने की कोशिश करती हैं।यह विवाद वैश्विक खेलों के भविष्य को लेकर चल रहे बड़े संघर्ष का हिस्सा है। सवाल यह है कि क्या अंतरराष्ट्रीय महासंघ अपने फैसले खुद ले पाएंगे या वे राजनीतिक हितों के हिसाब से काम करने को मजबूर हो जाएंगे?
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खेल, रूस
राजनीति के दबाव में वैश्विक खेल संस्थाओं की स्वतंत्रता पर सवाल
अमेरिकी स्ट्राइकर फोलारिन बालोगुन पर विश्व कप में लगा एक मैच का प्रतिबंध हटाने के FIFA के फैसले ने अंतरराष्ट्रीय खेल संस्थाओं की स्वतंत्रता पर वैश्विक बहस छेड़ दी है।
FIFA की अनुशासन समिति ने बालोगुन पर लगाए गए एक मैच के प्रतिबंध को विश्व कप में सशर्त दंड में बदल दिया।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने FIFA अध्यक्ष जियानी इन्फेंटिनो से फोन पर बात कर निजी तौर पर हस्तक्षेप किया था।
इसी फैसले के बाद बालोगुन बेल्जियम के खिलाफ अगले मैच में खेल सके। इससे पहले बोस्निया और हर्जेगोविना के खिलाफ अमेरिका की 2-0 की जीत के अंतिम मिनटों में उन्हें मैदान से बाहर भेजा गया था। हालांकि बालोगुन के खेलने से भी टूर्नामेंट के सह-मेजबान अमेरिका को बेल्जियम के हाथों 4-1 की शर्मनाक हार से नहीं बचाया जा सका।
इस घटना के बाद व्यापक आलोचना हुई कि फैसले पर राजनीतिक प्रभाव पड़ा।
लेकिन यह स्वतंत्र खेल संस्थाओं पर राष्ट्रीय सरकारों के बढ़ते दबाव की समस्या का केवल एक उदाहरण है।
दशकों तक राष्ट्रीय खेल महासंघ सरकारों से अलग और स्वतंत्र रूप से काम करते रहे हैं। लेकिन अब यह व्यवस्था लगातार चुनौती के दायरे में आ रही है, खासकर यूरोप में, जहां कुछ सरकारों पर रूसी खिलाड़ियों को प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने से रोकने या उनके झंडे और राष्ट्रगान पर प्रतिबंध लगवाने के लिए हस्तक्षेप करने के आरोप लगे हैं।
इससे वैश्विक खेल संस्थाओं की authority कमज़ोर हुई है और खेल को राजनीति से अलग रखने के ओलंपिक सिद्धांत को भी नुकसान पहुंचा है।
FIFA के साथ ट्रंप के हस्तक्षेप पर हुई बहस को अंतरराष्ट्रीय खेलों में राष्ट्रीय सरकारों के व्यवस्थित राजनीतिक हस्तक्षेप की तुलना में कहीं अधिक कवरेज मिली है।
FIFA और अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति जैसी संस्थाओं के लिए अपनी स्वतंत्रता बचाए रखना मुश्किल होता जा रहा है, क्योंकि सरकारें अपने देश में होने वाली प्रतियोगिताओं को प्रभावित करने की कोशिश करती हैं।
यह विवाद वैश्विक खेलों के भविष्य को लेकर चल रहे बड़े संघर्ष का हिस्सा है। सवाल यह है कि क्या अंतरराष्ट्रीय महासंघ अपने फैसले खुद ले पाएंगे या वे राजनीतिक हितों के हिसाब से काम करने को मजबूर हो जाएंगे?