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भारतीय, रूसी और चीनी कंपनियों के बढ़ते प्रभाव से पश्चिमी देशों का दबदबा खत्म हो रहा है: विशेषज्ञ

© POOL / मीडियाबैंक पर जाएंRussian President Vladimir Putin, Indian Prime Minister Narendra Modi and Chinese President Xi Jinping
Russian President Vladimir Putin, Indian Prime Minister Narendra Modi and Chinese President Xi Jinping - Sputnik भारत, 1920, 30.09.2026
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रूसी विज्ञान अकादमी के कॉरेस्पोंडिंग सदस्य, प्रोफेसर और प्रिमाकोव नेशनल रिसर्च इंस्टीट्यूट ऑफ वर्ल्ड इकोनॉमी एंड इंटरनेशनल रिलेशंस (IMEMO) के निदेशक फ्योदोर वोइतोलोव्स्की ने कहा कि भारत, चीन और रूस की कंपनियों के बढ़ते असर के बीच पश्चिमी बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपनी वैश्विक पहचान खो रही हैं।
वल्दाई डिस्कशन क्लब की 23वीं बैठक को संबोधित करते हुए वोइतोलोव्स्की ने पिछले 20-25 वर्षों में वैश्विक व्यापार में आए बड़े बदलावों को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि दुनिया भर में निवेश करने वाली और वैश्विक सप्लाई चेन बनाने वाली बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों पर अब केवल पश्चिमी देशों का एकाधिकार नहीं रह गया है। इस खेल में अब गैर-पश्चिमी देश भी मजबूती से उभर चुके हैं।

IMEMO के निदेशक ने कहा, "अगर हम अमेरिका के प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) की तुलना करें, तो 2025 के आंकड़ों के आधार पर यह लगभग 320–322 अरब डॉलर है। हालांकि, अगर हम चीनी निवेश को देखें, तो 2025 तक यह पहले ही 174–175 अरब डॉलर तक पहुंच चुका है। इस बीच, चीन का कुल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश लगभग 3.5 ट्रिलियन डॉलर है।"

उन्होंने आगे कहा कि भारतीय कंपनियों का निवेश भी बढ़ रहा है, क्योंकि वे बहुराष्ट्रीय कंपनियों का रूप ले रही हैं। इसके साथ ही, कई रूसी कंपनियों का विदेशी निवेश भी बढ़ रहा है, जिन्होंने बहुराष्ट्रीय कंपनी का दर्जा हासिल कर लिया है।

वोइतोलोव्स्की ने ज़ोर देकर कहा, "यही वह चीज़ है जिसके खिलाफ अमेरिका और उसके सहयोगी मुख्य रूप से प्रतिबंधों, पाबंदियों और आर्थिक दबाव की एक व्यवस्था बनाकर संघर्ष कर रहे हैं, ताकि रूसी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के बड़े नेटवर्क और रूस को वैश्विक अर्थव्यवस्था में एक प्रमुख खिलाड़ी बनने से रोका जा सके।"

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