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रूस के सहयोग से भारत स्वदेशी लड़ाकू विमानों के लिए आरडी-33 इंजन का करेगा निर्माण

A Russian technician prepares for the take-off of the MIG 29 M2 ahead of the 5th edition of the Aero India show at the Yelahanka Air Force Station in Bangalore, India, Feb. 6, 2005.
रक्षा क्षेत्र में भारत-रूस सहयोग का एक लंबा इतिहास है और यह लगातार आगे बढ़ रहा है। अब भारत रूस के साथ एक समझौते के बाद स्वदेशी लड़ाकू विमानों को शक्ति देने वाले इंजन RD-33 का निर्माण करेगा।
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मार्च के प्रारंभ में भारतीय एयरोस्पेस निर्माता हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) को RD-33 इंजन के निर्माण के लिए रक्षा मंत्रालय से 5,249.72 करोड़ रुपये का अनुबंध प्राप्त हुआ।

भारतीय रक्षा मंत्रालय ने एक बयान में कहा, "इन एयरो इंजनों का उत्पादन एचएएल के कोरापुट डिवीजन द्वारा किया जाएगा। उम्मीद है कि ये एयरो इंजन शेष सेवा जीवन के लिए मिग-29 बेड़े की परिचालन क्षमता को बनाए रखने के लिए भारतीय वायु सेना (IAF) की आवश्यकता को पूरा करेंगे।"

साथ ही बयान में कहा गया कि "इन इंजनों का उत्पादन रूसी मूल उपकरण निर्माता (OEM) से प्रौद्योगिकी हस्तांतरण (ToT) लाइसेंस के तहत भारत में किया जाएगा।"
दरअसल एचएएल को भारतीय वायुसेना के मिकोयान-गुरेविच मिग-29 लड़ाकू विमानों के लिए 100 से अधिक क्लिमोव आरडी-33 इंजन देने के लिए अनुबंधित किया गया है। इससे पहले एचएएल इन इंजनों को असेंबल करता रहा है।

मिग-29 का परिचालन और आरडी-33 इंजन

वर्ष 1984 में मिग-29 को पहली बार तत्कालीन सोवियत संघ यानी अब के रूस से ऑर्डर किया गया और यह 1987 में भारतीय वायु सेना के बेड़े में शामिल हुआ। भारतीय वायुसेना ने तीन स्क्वाड्रन में 66 मिग-29 संचालित किए हैं। उनकी सेवा अवधि को एक दशक तक बढ़ाने के लिए अपग्रेड के बाद इन्हें मिग-29 यूपीजी नाम दिया गया।
नया आरडी-33 इंजन इनके परिचालन जीवन को एक और दशक तक बढ़ा देगा। भारत अपने विमान वाहक बेड़े के लिए दो स्क्वाड्रन में नौसैनिक संस्करण 45 मिग-29K/KUB भी संचालित करता है, जो आरडी-33 के उन्नत संस्करण आरडी-33एमके द्वारा संचालित है।
इंजन डिवीजन, कोरापुट की स्थापना 1964 में मिग कॉम्प्लेक्स के हिस्से के रूप में की गई थी, जिसे मिग-21 के लाइसेंस निर्माण के लिए स्थापित किया गया था। उसी समय से कोरापुट ऐसे इंजनों का उत्पादन कर रहा है, जो भारतीय लड़ाकू कार्यक्रम के घटकों को शक्ति प्रदान करते हैं।
2005 में रूस के रोसोबोरोनेक्सपोर्ट और भारत के एचएएल ने कोरापुट सुविधा में 120 आरडी-33/3 श्रृंखला के निर्माण के लिए 250 मिलियन डॉलर के अनुबंध पर हस्ताक्षर किए। सुविधा ने 2007 में आरडी-33 को असेंबल करना शुरू किया।

भारत-रूस रक्षा सहयोग

रूस भारत का दीर्घकालिक और समय-परीक्षणित भागीदार रहा है। रक्षा सहयोग भारत-रूस रणनीतिक साझेदारी का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है। दोनों देशों के बीच सैन्य तकनीकी सहयोग के सभी मुद्दों की निगरानी के लिए एक संस्थागत संरचना है।
वर्तमान में चल रही द्विपक्षीय परियोजनाओं में टी-90 टैंक और सुखोई-30-MKI विमानों का स्वदेशी उत्पादन, मिग-29-K विमान और कामोव-31 और एमआई-17 हेलीकॉप्टरों की आपूर्ति, मिग-29 विमानों का उन्नयन और मल्टी-बैरल रॉकेट लॉन्चर Smerch की आपूर्ति शामिल है।
पिछले कुछ वर्षों में सैन्य तकनीकी क्षेत्र में सहयोग हथियारों की आपूर्ति से आगे बढ़कर संयुक्त अनुसंधान, डिजाइन विकास और अत्याधुनिक सैन्य प्लेटफार्मों के उत्पादन तक विकसित हुआ है। ब्रह्मोस क्रूज़ मिसाइल का उत्पादन इसका एक बेजोड़ उदाहरण है। दोनों देश पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान और बहुउद्देश्यीय परिवहन विमान के संयुक्त डिजाइन और विकास में भी काम कर रहे हैं।
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